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शहादत का दरवाजा बना सामिया गार्डन सिटी, हर टावर सुनाता बलिदान की कहानी

शहीदों की विरासत को जिंदा रखने में जुटे डॉक्टर मरगूब त्यागी

शहादत का दरवाजा बना सामिया गार्डन सिटी, हर टावर सुनाता बलिदान की कहानी

– 1857 के वीर चौधरी जबरदस्त खां के नाम पर बना मुख्य द्वार

– बहादुर शाह जफर से लेकर अशफाक उल्ला तक शहीदों के नाम पर टावर

– शहीदों की विरासत को जिंदा रखने में जुटे डॉक्टर मरगूब त्यागी

– अंग्रेजों ने जब्त कर ली थी खानदानी जमीन

– आज भी परिवार हर वर्ष याद करता है 1857 की शहादत

नाइन न्यूज नेटवर्क, हापुड़।

इतिहास केवल किताबों में बंद तारीखों का नाम नहीं होता, कुछ लोग उसे अपनी सांसों में जिंदा रखते हैं। हापुड़ के बुलंदशहर रोड स्थित सामिया गार्डन सिटी में पहुंचते ही ऐसा ही एहसास होता है। यहां बना विशाल मुख्य द्वार केवल एक प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि 1857 की क्रांति में फांसी पर चढ़े शहीद चौधरी जबरदस्त खां की शहादत का प्रतीक बन चुका है। गार्डन सिटी के भीतर बने टावर भी महज इमारतें नहीं हैं, बल्कि देश के उन वीरों की याद हैं जिन्होंने आजादी के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी।

 

शहीद चौधरी जबरदस्त खां के प्रपौत्र डॉक्टर मरगूब त्यागी बताते हैं कि अगर 1857 के वीरों ने बलिदान न दिया होता तो आज देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा होता। यही वजह है कि सामिया गार्डन सिटी में शहीदों के नाम को हमेशा जिंदा रखने का प्रयास किया गया। उन्होंने बताया कि यहां बहादुर शाह जफर, रानी झांसी, बेगम हजरत महल, अशफाक उल्ला खान, रामप्रसाद बिस्मिल और परमवीर अब्दुल हमीद के नाम पर टावर बनाए गए हैं। इसके अलावा रजा टावर और बतूल टावर उनके माता-पिता की याद में बनाए गए।

 

डॉक्टर मरगूब त्यागी का कहना है कि नई पीढ़ी को शहीदों की कुर्बानी का इतिहास पता होना चाहिए। लोग केवल नाम पढ़कर आगे न निकल जाएं, बल्कि यह भी जानें कि इन शहीदों ने देश के लिए क्या खोया और क्या दिया। इसी सोच के साथ सामिया गार्डन सिटी को शहीदों की याद से जोड़ने का फैसला लिया गया।

1857 की क्रांति में चौधरी जबरदस्त खां का नाम हापुड़ ही नहीं, पूरे मेरठ मंडल में जाना जाता था। वह मेरठ छावनी में सैनिक थे और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आग भड़काने वाले प्रमुख लोगों में शामिल रहे। 10 मई 1857 को जब क्रांति की चिंगारी भड़की तो उन्होंने अंग्रेज अफसरों का विरोध करते हुए दिल्ली की ओर कूच किया था।उनका मकसद बहादुर शाह जफर को देश का शासक बनाना था।

अंग्रेजों ने बाद में उन्हें और उनके भाई नवाबउल्त खां को गिरफ्तार कर लिया। दोनों को झूठे मुकदमे में फंसाया गया और 14 सितंबर 1857 को अंग्रेज अफसर हुसलन ने फांसी पर चढ़ा दिया। इतना ही नहीं, अंग्रेजों ने उनकी बुलंदशहर रोड स्थित पूरी जायदाद भी जब्त कर ली। परिवार को खत्म करने तक के आदेश जारी कर दिए गए थे। बताया जाता है कि परिवार के कारिंदे रहमान ने जान जोखिम में डालकर अब्दुल्ला को बचाया और उसे लेकर कश्मीर चला गया। बाद में रहमान ने अपनी जिंदगी के अंतिम समय में पूरी कहानी अब्दुल्ला को बताई। इसके बाद अब्दुल्ला हापुड़ लौटे और मेरठ में बैरिस्टर बने। उन्होंने अंग्रेजों से कानूनी लड़ाई लड़कर परिवार की जमीन वापस हासिल की। आज भी वह जमीन गांव इमटौरी में मौजूद है। डॉक्टर मरगूब त्यागी बताते हैं कि चौधरी जबरदस्त खां का व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली था। शहर में उनका अलग ही सम्मान था। यही वजह है कि शहादत के 169 वर्ष बाद भी लोग उन्हें याद करते हैं। सामिया गार्डन सिटी का मुख्य द्वार भी उसी शान और ऐतिहासिक शैली में तैयार कराया गया है, जैसा पुराने दौर के राजदरबारों में होता था। वर्ष 2004 में सामिया गार्डन सिटी का शिलान्यास हुआ था। समय के साथ जब इसका विस्तार बढ़ा तो डॉक्टर मरगूब त्यागी ने इसे केवल आवासीय परियोजना न रखकर शहीदों की याद से जोड़ने का निर्णय लिया। इसके बाद मुख्य द्वार और टावरों को स्वतंत्रता सेनानियों के नाम समर्पित कर दिया गया। आज यहां आने वाला हर व्यक्ति शहीदों के नाम पढ़कर उनके संघर्ष और बलिदान को याद करता है।

शहीदों ने जो बलिदान दिया उसकी जानकारी हमको होनी चाहिए: डॉ. मरगूब त्यागी

 

शहीद चौधरी जबरदस्त खां के प्रपौत्र डॉक्टर मारगूब त्यागी बताते हैं कि चौधरी जबरदस्त का अपना ही जलवा था। अन्याय के खिलाफ ना वह कभी झुके और ना ही किसी की गुलामी उन्होंने की। आजादी के लिए हंसते-हंसते उन्होंने शहादत दी थी। उन्होंने बताया कि सामिया गार्डन सिटी में बहादुर शाह जफर, रानी झांसी टावर, हजरत महल टावर, अशफाक उल्ला खान टावर, बिस्मिल टावर व दो टावरों के नाम उनके स्वर्गीय माता- पिता के नाम रजा टावर व बतूल टावर के नाम पर रखे गए हैं। शहीदों ने जो बलिदान हम लोगों के लिए दिया उसकी जानकारी हम सभी को होनी चाहिए। इन सभी टावरों के नाम शहीदों के रखने के लिए सामिया गार्डन सिटी की मंशा है कि लोग शहीदों को याद रखें और उनके बलिदानों को भी कभी भुला ना सके। यही हमारे शहीदों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी

 

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कौन थे शहीद जबरदस्त खां

 

 

चर्बी लगे कारतूसों को आधार बनाकर विद्रोह की आग सुलगाने में मेरठ छावनी के सैनिकों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इनमें एक वीर सैनिक हापुड़ के मोहल्ला भंडा पट्टी निवासी चौधरी जबरदस्त खां भी थे। चौधरी जबरदस्त खां 10 मई 1857 को अंग्रेज अफसर का विरोध कर दिल्ली की ओर मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को देश का शासक बनाने के लिए घर से निकल गये थे। उन्हें और उनके भाई नवाबउल्त खां को पकड़कर झूठे मुकदमे में फंसाकर 14 सितंबर 1857 को हुसलन नामक अंग्रेज अफसर ने फांसी पर चढ़ा दिया। जबरदस्त खां की बुलंदशहर रोड स्थित जायदाद अंग्रेजों ने जब्त कर ली थी। अंग्रेजों के कहने पर पुरे परिवार को कत्ल करने के आदेश के बाद परिवार का कारिंदे रहमान ने अब्दुल्ला का पालन पोषण किया। अंग्रेजों के दमन के आगे रहमान अब्दुल्ला को लेकर कश्मीर चला गया था। रहमान ने जीवन के अंतिम क्षणों में अब्दुल्ला को पूरे मामले की जानकारी दी थी। जिसके के बाद वह हापुड़ आए और मेरठ में बैरिस्टर हुए। अंग्रेजों से मुकदमा लड़कर खानदानी जमीन वापस ले ली। फिलहाल यह जमीन गांव इमटौरी में है। आज भी उनकी याद में परिवार के लोग 1857 को याद करते हुए चौधरी जबरदस्त खां को श्रद्धांजलि देते है।

 

1857 की क्रांति में मेरठ छावनी से उठी थी चिंगारी –

मेरठ छावनी में चर्बी लगे कारतूसों के विरोध से शुरू हुआ विद्रोह धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत में फैल गया था। चौधरी जबरदस्त खां भी उन्हीं सैनिकों में शामिल थे जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी थी।

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फांसी के बाद अंग्रेजों ने जब्त कर ली थी जायदाद –

शहादत के बाद अंग्रेजों ने चौधरी जबरदस्त खां की बुलंदशहर रोड स्थित संपत्ति कब्जे में ले ली थी। परिवार को खत्म करने तक की तैयारी कर ली गई थी ताकि विद्रोह की कोई निशानी बाकी न बचे।

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कारिंदे रहमान ने बचाई थी परिवार की आखिरी उम्मीद –

परिवार के कारिंदे रहमान ने जान जोखिम में डालकर अब्दुल्ला को बचाया और कश्मीर ले गया। बाद में उसी ने पूरी कहानी बताई, जिसके बाद परिवार दोबारा हापुड़ लौट सका।

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बैरिस्टर बनकर वापस लौटे और जीती पुश्तैनी जमीन –

अब्दुल्ला ने मेरठ में बैरिस्टर बनकर अंग्रेजों से कानूनी लड़ाई लड़ी। लंबी पैरवी के बाद परिवार अपनी जमीन वापस हासिल करने में सफल हुआ। आज भी इमटौरी में वह जमीन मौजूद है।

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हर टावर के पीछे छिपी है आजादी की कहानी –

सामिया गार्डन सिटी में बने टावर केवल नाम नहीं हैं। बहादुर शाह जफर, रानी झांसी, अशफाक उल्ला खान, बिस्मिल और परमवीर अब्दुल हमीद जैसे शहीदों के नाम नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का काम कर रहे हैं।

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